छत्तीसगढ़ की जनजातियां

छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ

छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ

परिचय:

2011 की जनगणना के अनुसार छ.ग. राज्य में अनुसूचित जनजाति की कुल जनसंख्या 78,22,902 है। प्रदेश की कुल जनसंख्या का लगभग एक तिहाई जनसंख्या ( 30.6% )अनुसूचित जनजातियों की है। 2001 की जनगणना में राज्य की कुल जनसंख्या का 31.8% हिस्सा अनुसूचित जनजातियों का था। इस प्रकार 2001 के तुलना में 2011 में जनजातियों की जनसंख्या में कमी आई है। राज्य में कुल 42 अनुसूचित जनजातियाँ पायी जाती है। ये 42 अनुसूचित जनजातियाँ पुनः 161 उपसमूहों में विभाजित है।

 

छ.ग. की प्रमुख जनजातियाँ:

1. गोंड जनजाति : जनसंख्या की दृष्टि से ये राज्य की सबसे बड़ी जनजाति है। ये बस्तर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, कोंडागांव, कांकेर, सुकमा,जांजगीर-चंपा और दुर्ग जिले में पाये जाते है।गोंड तथा उसकी उपजातिया स्वयं की पहचान ‘कोया’ या ‘कोयतोर शब्दों से करती है जिसका अर्थ ‘ मनुष्य’ या ‘पर्वतवासी मनुष्य’ है।गोंड जनजाति में मदिरापान का काफी ज्यादा प्रचलन है। इनके मुख्य देवता ‘दूल्हा देव’ है।इनमे विधवा तथा बहु विवाह का प्रचलन भी पाया जाता है। गोंड में दूध लौटावा विवाह भी देखने की मिलता है। ये लोग बहूत ईमानदार होते है।
2. बैगा जनजाति: इस जनजाति की उपजातियों में ‘नरोतिया’, ‘भरोतिया’, ‘रायमैना’, ‘कंठमैना’ और ‘रेमैना’ आदि प्रमुख हैं। बैगा लोगों में संयुक्त परिवार की प्रथा पायी जाती है। इनमें मुकद्दम गाँव का मुखिया होता है।

‘बैगा’ का अर्थ होता है- “ओझा या शमन”। इस जाति के लोग झाड़-फूँक और अंध विश्वास जैसी परम्पराओं में विश्वास करते हैं।इस जाति का मुख्य व्यवसाय झूम खेती एवं शिकार करना है।इस जाति के लोग शेर को अपना अनुज मानते हैं।इनमें सेवा विवाह की ‘लामझेना’, ‘लामिया’ और ‘लमसेना’ प्रथा प्रचलित है।बैगा जनजाति के लोग पीतल, तांबे और एल्यूमीनियम के आभूषण पहनते हैं।इस जाति में ददरिया प्रेम पर आधारित नृत्य दशहरे पर एवं परधौनी लोक नृत्य विवाह के अवसर पर होता है।

3.कोरबा जनजाति: ये कोरबा,बिलासपुर,सरगुजा,सूरजपुर,एवं रायगढ़ जिले के पूर्वी भाग में निवास करते है। इनके उपजाति में ‘ दिहारिया’ एवं ‘पहाड़ी कोरबा प्रमुख है। दिहारिया कोरबा कृषि कार्य करते है। इस कारण ‘किसान कोरबा भी कहा जाता है। पहाड़ी कोरबा को ‘बेनबरिया’ भी कहा जाता है। कोरबा जनजाति की अपनी पंचायत होती है। जिसे ‘मैयारी’ कहते है। कोरबा जनजाति का मुख्य त्योहार ‘करमा’ होता है।

4. मारिया जनजाति: ये नारायणपुर, बस्तर,कोंडागांव एवं बिलासपुर जिले में पाये जाते है। भूमियां, भुईहार एवं पांडो इस जनजाति की प्रमुख उपजाति है। ‘भीमसेन’ इन लोगो का मुख्य देवता है।

5.हल्वा जनजाति: ये बस्तर,रायपुर,कोंडागांव,कांकेर,सुकमा, दंतेवाड़ा एवं दुर्ग जिले में निवास करते है। इनकी उपजातियों में बस्तरिया,भतेथिया,छत्तीसगढ़िया आदि मुख्य है। हलवाहक होने के कारण इस जनजाति का नाम हल्वा पड़ा है।

6.कोरकू जनजाति: ये रायगढ़,सरगुजा,बलरामपुर और जशपुर जिलो में निवास करते है। मोवासी, बवारी, रूमा, नहाला, बोडोया आदि इनकी उपजातियां है।इस जनजाति में विवाह संबंध में वधु-धन चुकाना पड़ता है। इनमे तलाक़ प्रथा एवं विधवा विवाह का भी प्रचलन है।

7. बिंझवार जनजाति: ये बिलासपुर,रायपुर,बलौदा बाजार जिले में निवास करते है। ये “विन्ध्याचल वासिनी देवी” की पूजा करते है।ये अपने को विंध्यवासिनी पुत्र “बारह भाई बेतकर” को अपना पूर्वज मानते है। वीर नारायण सिंह इसी समुदाय के थे।

8. कमार जनजाति: ये रायपुर,बिलासपुर,रायगढ़,दुर्ग,गरियाबंद, राजनांदगांव,जांजगीर-चाम्पा, जशपुर,कोरिया,सरगुजा के वन क्षैत्रों में रहते है। इनका मुख्य देवता ” दूल्हा देव” है। ये अधिकतर कृषि मजदुर के रूप में खेतो में काम करते है। ये लकड़ी और बांस की चीजें बनाने में निपुण होते है।

9. कंवर जनजाति: ये बिलासपुर,रायपुर,रायगढ़,जंगीर-चाम्पा एवं सरगुजा ज़िलों में पाये जाते है। ये लोग अपनी उत्पत्ति महाभारत के कौरव से बताते है। इनमे संगोत्री विवाह और विधवा विवाह वर्जित है। “सगराखंड” इनकी प्रमुख देवता है। ये कृषक एवं कृषक मजदुर है।

10. खैरवार जनजाति: ये सरगुजा,सूरजपुर,बलरामपुर तथा बिलासपुर जिले में पाये जाते है।इन्हे ‘कथवार’ भी कहा जाता है। कत्था का व्यवसाय करने के कारण इस जनजाति का यह नाम पड़ा है।

11. भैना जनजाति: सतपुड़ा पर्वतमाला एवं छोटानागपुर पठार के बीच सधन वन क्षेत्र के मध्य बिलासपुर, जांजगीर चाम्पा, रायगढ़,रायपुर,बस्तर जिलो में पाये जाते है। इस जनजाति की उत्पत्ति मिश्र संबंधो के कारण हुआ प्रतीत होता है। किंवदन्ती के अनुसार ये ” बैगा और कंवर ” की वर्ण संकर संताने है।

12. ओरांव जनजाति: ये रायगढ़,जशपुर,सरगुजा और बिलासपुर जिलों में पाये जाते है। इनके नाम पशुओं, पक्षियों, मछली,पौधों तथा वृक्षों के नाम पर रखे जाते है। इनमे लड़के लड़कियां विवाह से पूर्व स्वच्छन्द रहते है। इनमे विवाह से पूर्व यौन संबंधों पर आपत्ति नही की जाती है। इनमे तलाक,विधवा एवं बहु विवाह का भी प्रचलन है। ओरांव के प्रमुख देवता ” धर्मेश ” है, जो सूर्य देवता का ही रूप है।

 

छ. ग. के विशेष पिछड़ी जनजातियाँ:

छग में मुख्यत: 5 विशेष पिछड़ी जनजातिया थी जबकि 2012 में छग सरकार द्वारा अधिसूचना जारी करके दो और जनजातियों भूंजिया व पंडो को इस श्रेणी में शामिल किया जिससे इनकी संख्या 7 हो गयी है।
(1)बैगा: कबीरधाम,बिलासपुर, कोरिया, राजनांदगाव,मुंगेली :- 71862
(2)पहाड़ी कोरवा: सरगुजा, जशपुर, कोरबा, बलरामपुर :- 37472
(3)पण्डो: सूरजपुर,बलरामपुर,सरगुजा :- 31814
(4)कमार: गरियाबंद,धमतरी,महासमुंद,कांकेर:- 23288
(5)अबूझमाड़िया: नारायणपुर,दंतेवाड़ा,बीजापुर:- 19401
(6)भुंजिया: गरियाबंद,धमतरी:- 7199
(7)बिरहोर: रायगढ़,जशपुर, बिलासपुर,,कोरबा :-3034

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